Tuesday, September 15, 2020

निर्माण की शिक्षा व्यवस्था

 निर्माण की जो शिक्षा व्यवस्था है वह बिल्कुल नई शिक्षा नीति 2020 से , मिलती - जुलती है । शिक्षा मंत्रालय जिस नीति को अब लागू करने जा रहा है , उसे निर्माण संस्था पिछले 30 सालों से अपने अध्यापन कार्य में प्रयोग कर रही है। इस संस्था की नींव1990 में रखी गई थी तब से ही यह संस्था शिक्षा के क्षेत्र में निम्नलिखित बिंदुओं पर लागातार कार्यरत है । जैसे :-
1) 3-6 साल तक के बच्चों के लिए केयर एवं एजुकेशन की एक अलग तरह की शिक्षा व्यवस्था है और उनका अलग तरह का पाठ्यक्रम है, इसके अन्तर्गत उन्हें उनके वातावरण के प्रति जागरूक किया जाता है, उन्हें उनकी जिम्मेदारी सौंपी जाती है, ये भी सिखाया जाता है कि उन्हें अपनी बात कैसे दूसरों के सामने रखनी है? अपने शरीर और अपने सामान की कैसे देखभाल करना है ? किस तरह से और क्या खाएं कि वे स्वस्थ एवं मजबूत बने। इस उम्र के बच्चों के साथ इस प्रकार से कार्य किया जाता है कि उनकी हाथ की उंगलियों और आंखों का कोर्डिनेशन अच्छा हो सके। इसके लिए उन्हें तरह - तरह के खेल और क्रिया-कलाप कराये जाते हैं। उनकी उंगलियों की मांसपेशियां सही प्रकार से विकसित हों इसलिए उन्हें पेन्सिल का प्रयोग न करा कर मोम कलर से कार्य कराया जाता है।


2) निर्माण संस्था में बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था ही इस प्रकार से की गई है कि उनमें नये - नये कौशल का विकास हो सके। कक्षा -१ से ही उन्हें विभिन्न कौशलों से परिचित करा दिया जाता है , जैसे :- रिसर्च करना, किसी का इंटरव्यू लेना, क्रियात्मक लेख, फ्री ड्राइंग, क्राफ्टवर्क, बागवानी आदि। उन्हें विभिन्न प्रकार की जिम्मेदारियां देकर लीडरशिप के गुण भी सिखा  देते हैं। जिम्मेदार बनाने के लिए उनको विद्यालय में अपने सामान को कहां रखना है , इसे कक्षाअध्यापिका सीखाती है, इसके लिए हर कक्षा में काॅपी-किताब, पानी की बोतल, टिफिन रखने की एक निश्चित जगह बनाई जाती है, जहां बच्चे इसे रखकर रोज़ अपना बैग खाली कर देते हैं और छुट्टी के बाद वापस इसे अपने बैग में रखते हैं। इस तरह से उन्हें बचपन से ही जिम्मेदार बनने की शिक्षा दी जाती है। इसी प्रकार रोज़ हर बच्चा कक्षा के बाहर ही अपना जूता-मोजा उतार कर कक्षा में प्रवेश करता है, इसके द्वारा वह अपने जूतों को लाईन में रखना और जूते की लेस बांधना सीखते हैं।

3) एक्सट्रा करिकुलम एक्टविटिज- मेन करिकुलम शामिल:- इसके अनुसार भी निर्माण में अध्यापन कार्य के लिए जो भी कार्ययोजना बनाई जाती है, उसी के साथ ही एक्सट्रा करिकुलम एक्टविटिज भी जोड़ दी जाती है , जैसे आर्ट, म्यूजिक, डांस, रिसर्च, नाटक, भ्रमण आदि। इन क्रियाकलापों के बिना निर्माण में कार्ययोजना अधूरी मानी जाती है।

4) रिपोर्टकार्ड में लाइफ स्किल शामिल:- इसके तहत भी निर्माण में रिपोर्टकार्ड  भी कई सालों से  इसी प्रकार प्रयोग किया जा रहा है, इसमें लाइफ स्किल के कई काॅलम होते ही हैं, जैसे कि म्यूजिक, डांस, योगा, थियेटर, कराटे, स्पोर्ट्स, सिलाई- कढ़ाई आदि ।


5) स्कूल के बाद वयस्क शिक्षा एवं लाईब्रेरी:- इस नीति के अनुसार भी निर्माण में एक बहुत बड़ी और अच्छी लाइब्रेरी है, जिसमें हर प्रकार और हर लेवल की पुस्तकें हैं। इस लाइब्रेरी में कोई भी बाहरी विद्यार्थी या पढ़ने का इच्छुक व्यक्ति आकर पढ़ सकता है, यह सबके लिए खुली हुई है, इसका कोई शुल्क नहीं लिया जाता है। इसका बस एक ही मकसद है कि लोगों में पुस्तक के प्रति प्रेम और अध्ययन में रूचि पैदा हो सके । इसी प्रकार वयस्को के लिए भी शिक्षा की व्यवस्था है , स्कूल के बाद सुचारू रूप से उनकी कक्षा चलती है और उनके लेवल के अनुसार उन्हें पढ़ाया जाता है। व्यस्कों में यहां पर नान टीचिंग स्टाफ को भी शिक्षित किया जाता है, जो जिस लेवल का होता है , उसे उसकी आगे की शिक्षा दी जाती है।


6) स्कूल लेवल पर वोकेशनल स्टडी पर फोकस:- इस नई शिक्षा नीति के अनुसार निर्माण संस्था में 30 सालों से वोकेशनल स्टडी पर फोकस किया जा रहा है। जैसे बागवानी, सिलाई -कढ़ाई, बढ़ईगिरी, कुकिंग आदि। इन सबकी कक्षाएं सप्ताह में एक दिन अवश्य रखी जाती है, ये उनके टाइम टेबल में लिखा रहता है और नियमित रूप से इन सबकी कक्षाएं संचालित होती हैं।

7) बैगलेस पिरियड (10दिन)  :-  इस नई शिक्षा नीति के अनुसार भी निर्माण संस्था पिछले कई सालों से कार्य करता चला आ रहा है , इस कार्य के लिए विद्यालय में जाड़े के दिनों में आर्ट कैंप लगाया जाता है, जिसमें बच्चों को 4 - 5 दिन तक स्कूल में ही रहना होता है उस दौरान बच्चे को बहुत ही नियोजित तरीके से वोकेशनल ट्रेनिंग दी जाती है, जैसे - मिट्टी के बर्तन बनाना, बांस की डलिया बनाना, चारपाई बनाना, स्वेटर बनाना, थियेटर, खाना बनाना आदि प्रकार के स्किल सीखाये जाते हैं। यह बहुत उपयोगी होता है बच्चे बहुत कुछ आनंद के साथ सीखते हैं। इसी प्रकार साल में चार से छह दिन ऐसा अवसर आता है, जबकि बच्चे बिना बैग के आते हैं और तमाम तरह की कलाएं सीखते हैं और अपनी हाथ से बनी हुई चीजों का प्रदर्शन करते हैं।


8) बैग का बोझ कम:- इसके अनुसार भी निर्माण में बैग का बोझ कम से कम ही रखने की कोशिश की जाती है जिसमें बच्चों की काॅपी-किताब स्कूल में ही रखने की व्यवस्था है, उन्हें वही काॅपी-किताब घर ले जाने की अनुमति दी जाती है , जिसमें कि गृहकार्य मिला हो। गृहकार्य भी बहुत ही सुनियोजित तरीके से ही दिया जाता है। यह पहले से ही निश्चित होता है कि एक दिन में किन-किन विषयों का और कितना गृहकार्य दिया जायेगा।


9) शिक्षा का माध्यम स्थानिय/क्षेत्रिय भाषा में होगा:- इस नीति के तहत भी निर्माण संस्था में नियम है कि अगर कोई बच्चा अपनी क्षेत्रीय भाषा में जबाव देता है या फिर उत्तर लिखता है तो उसे टोका नहीं जाता है और न ही उसे मना किया है, वह अपनी भाषा में अपनी बात को व्यक्त कर सकता है। यह एक अंग्रेजी माध्यम का स्कूल है इसलिए अंग्रेजी भाषा के साथ -साथ अन्य भाषाओं को भी उसी प्रकार महत्व दिया जाता है, जैसे कि अंग्रेजी को। समय-समय पर बच्चे नाटक, लेखन, नृत्य-संगीत आदि के माध्यम से अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी सीखते रहते हैं।


10) सभी चरणों में प्रायोगिक परीक्षा:- निर्माण में प्रत्येक सत्र में सभी विषयों में सिर्फ लिखित परीक्षा न होकर बल्कि साथ-साथ प्रायोगिक परीक्षा भी ली जाती है।


11) सामग्री विचार- अनुप्रयोग, समस्या समाधान पर केन्द्रित होगी:- निर्माण संस्था में शिक्षा व्यवस्था ही इस प्रकार की गई है कि वह समस्या समाधान पर केन्द्रित हो। बच्चों को पढ़ाने की पद्धति और उन्हें प्रश्न-उत्तर लिखने का तरीका, परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्न-पत्र इस प्रकार तैयार किए जाते हैं कि वे उसका उत्तर अपने जीवन से जोड़ कर प्रश्नों के उत्तर लिख पायें और वे उसे अपने जीवन से जोड़ कर भविष्य में आने वाली समस्या को सुलझा सकें


12) पाठ्य पुस्तक सामग्री को कम करना:-  निर्माण संस्था में एन.सी.आर.टी. की ही पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं लेकिन इसके साथ -साथ अन्य बहुत सारी चीजों को जोड़ने और कुछ टाॅपिक को टीचर कम करने के लिए भी स्वतंत्र हैं। यहां पर इस बात पर ज़ोर नहीं दिया जाता है कि किसी भी तरह करके  कोर्स पूरा हो जाये बल्कि इस बात पर जोर दिया जाता है कि जो बच्चे को पढ़ाया गया है, उसे वह अच्छी तरह से समझ पाये और अपने जीवन में प्रयोग कर सकें।


13) पोषण और स्वास्थ्य कार्ड, स्कूल के छात्रों के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच :- इस नई शिक्षा नीति के तहत हम यह बताना चाहेंगे कि निर्माण संस्था में एडमिशन के समय ही अभिभावकों से बच्चे का मेडिकल सर्टिफिकेट मांगा जाता है और फिर उसी के अनुसार उसकी शिक्षा व्यवस्था की जाती है। समय- समय पर उसके अभिभावक से भी हेल्थ के बारे में बात करते रहते हैं। डॉक्टर को बुला कर स्वास्थ्य परीक्षण भी करवाते हैं। इस विषय पर अभिभावकों के लिए वर्कशॉप आयोजित करते हैं, जिसमें यह बताया जाता है कि किस प्रकार के पोषक तत्वों से भरपूर चीजें बच्चों के आहार में शामिल करना चाहिए और उनके घर की दिनचर्या किस प्रकार होनी चाहिए जिससे कि बच्चे का स्वास्थ्य अच्छा रहे। स्कूल में भी उन्हें रोज़ कोई भी एक मौसमी फल खाने के लिए  प्रोत्साहित किया जाता है और उसे खाने के लिए स्कूल में ही समय निर्धारित कर दिया जाता है, जिससे कि वे स्वस्थ रह सकें। इसी के साथ -साथ यह भी ध्यान रखा जाता है कि क्या वे टिफिन लाते हैं और क्या लाते हैं , ठीक से खाते हैं कि नहीं ये सारी चीजें नियमित रूप से चेक की जाती हैं। जो बच्चे टिफिन नहीं ला पाते हैं उन्हें स्कूल से ताजा पोषण युक्त भोजन दिया जाता है।


                     इस प्रकार से देखा जाए तो निर्माण संस्था  बहुत समय पहले से ही नई शिक्षा नीति के नियमों का पालन कर रही है और उसमें वह सफल भी हुई है ,इसका हमारे पास प्रमाण भी है क्योंकि जो बच्चे इस संस्था से पढ़ कर निकलें हैं वे अपने क्षेत्र में सफल हैं और बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं।

सुनीता त्रिपाठी

Sunday, September 6, 2020

ऑनलाइन कक्षा का अनुभव

 वैसे तो देखा जाए की छोटी से छोटी चीज में भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है बस हमें एकाग्रता के साथ उससे जुड़ने की आवश्यकता है उसी प्रकार इस महामारी के चलते जो ऑनलाइन कक्षाएं शुरू हुई है उससे भी हमने बहुत कुछ सीखा । बच्चों के सामने रहकर पढ़ाना और एक ऑनलाइन कक्षा लेना एक अलग ही अनुभव है। टेक्नोलॉजी से जुड़ी कई तकनीकों से हमारा परिचय हुआ हम इतना परिश्रम कर रहे हैं पर कुछ बच्चों और अभिभावकों का सहयोग न मिलने के कारण हमारा मन खिन्न हो जा रहा है । बेटावर के कुछ बच्चों को तो हम लोग होमवर्क और क्लास वर्क दोनों करवाते थे । उनके घर में कोई भी सहयोग नहीं करने वाला है । यहा तक कि किसी- किसी के तो मम्मी - पापा ध्यान ही नहीं दे पाते वो शिक्षित नही है या इतने व्यस्त रहते है कि वह बच्चे अपने नाना-नानी या दादा- दादी के साथ रहते हैं दिन भर रहते हैं। और उनको पढ़ाई समझ में नहीं आती है या तो दिखती नहीं है तो वह बच्चे पूरा हम लोगों पर निर्भर थे ।

इसके पहले मैंने एक मदर टीचर का रिलेशन बनाकर बच्चों को पढ़ाया है लेकिन वह चीज़ मै अब  पूर्ण नहीं कर पा रही हूं। उन बच्चों को छूना उन्हें समझाना उनके मन में झांकना यह सब तो नहीं हो पा रहा है इसलिए मुझे एक खालीपन सा महसूस होता है क्योंकि छोटे बच्चे हैं न उन्हें बहुत धैर्य के साथ समझाना पड़ता है खेल- खेल में उन्हें पढ़ाना एवं सिखाना पड़ता है। अभिभावक भी काम करवा तो रहे हैं । लेकिन एक मोटे तरीके से खानापूर्ति हो रही है। क्योंकि अपने बच्चे को ही वह आगे देखना चाहते हैं। और हम अध्यापिकाएं सभी बच्चों को आगे देखना चाहते हैं प्रत्येक बच्चे पर ध्यान देती हैं ।एवं जो बच्चे नहीं कर पाते हैं उसे ज्यादा ध्यान देते हैं वैसे देखा जाए तो अभिभावकों का सोचना गलत नहीं है मैं भी अपने बच्चों को अगर देखूं तो मैं उसको आगे बढ़ते हुए देखना चाहूंगी।




अभी जो यह समय चल रहा है उसमें हम ऑनलाइन कक्षाएं चलाकर एक कड़ी जोड़े हुए हैं जिस कड़ी को मजबूत रखना एक अभिभावक का महत्वपूर्ण कर्तव्य है । मैं उन सभी अभिभावकों से नम्र निवेदन करती हूं कि वह इसी तरह हमारा साथ देते रहें और हमारी आत्मविश्वास का बल बढ़ाते रहें ताकि हम सभी बच्चों को एक जैसा सिखा सकें। जीवन है तो समस्या आएंगी ही उसे स्वीकार ना चाहिए ना कि घबराना । हमें विश्वास है कि जो भी अभिभावक अभी तक नहीं करवा पाए या नहीं करवा रहे हैं तो आगे जरूर करवाएंगे और हमारे इस कड़ी को जोड़ने में हमारी हर संभव प्रयास करते रहेंगे। ना हम हारेंगे ना किसी को हारने देंगे।



धन्यवाद

दीप्ति

प्री स्कूल अध्यापिका




Saturday, September 5, 2020

आनलाइन क्लास और मेरा अनुभव

 आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के युग में जैसे हर चीज घर में बैठे उपलब्ध हो जा रही है वैसे ही शिक्षण संबंधी सामग्री भी हमें घर बैठे ही मिल जा रही है ।इसके लिए अनेक प्लेटफार्म है जहाँ ये अकाट्य सत्य हैकि "बच्चे हमारी आखें हैं और शिक्षा उनकी रोशनी" वहां प्रत्येक व्यक्ति का शिक्षित होना अतिआवश्यक है ।अब सवाल ये उठता है कि क्या ऑनलाइन कक्षाएं हमारे स्कूल की कमी को पूरा कर सकने में सक्षम हैं?


क्योकि कोविड 19 महामारी के चलते आज भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के सभी स्कूलों को बंद करना पड़ा है और घर बैठे बच्चो को पढ़ाने का एक विकल्प खोजा गया है जो 3-8साल के बच्चो के लिए तो "ना से हा भला "ही कहा जा सकता है क्योकि इस उम्र के बच्चे किताब की अपेक्षा देखकर, सुनकर और करके ज्यादा सीखते हैं ।यही वो उम्र है जब बच्चा अपने परिवार के बाद समाज से परिचित होता है, उसे नये-नये दोस्त मिलते हैं, टीचर मिलती हैं जिनके सामने अपने अनुभूति को अभिव्यक्त करना सीखता है ।इसलिए कक्षा की सभी गतिविधियों को पूरी तरह सीखा पाना तो संभव नहीं किन्तु इनमें सेअधिकांश गतिविधियों को सिखाने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जा रहा है जिससे उनकी सीखने की प्रक्रिया को सरल व रोचक बनाया जा सके किन्तु इस कार्य को सफ़ल बनाने में हमें अभिभावक के सहयोग की भी अपेक्षा है क्योंकि बच्चे इस समय उनके साथ हैं हमारे साथ नहीं । मोबाइल में देखना और देखकर समझाना या बताना अब उनकी जिम्मेदारी बन जाती है। इस तरह एक बच्चे को पढ़ाने में दो लोगों को अपना उतना ही समय देना पड़ रहा है ।एक को पठन सामग्री तैयार करके भेजने में तथा दूसरे को बच्चे से करवाने में।स्कूल में यह काम सिर्फ टीचर द्वारा ही हो जाता है।

अतः इस कार्य में जिस बच्चे के अभिभावक जागरूक और शिक्षित हैं उस बच्चे की पढ़ाई तो सुचारू रूप से चल रही है किंतु जिनके अभिभावक जागरूक या शिक्षित नहीं हैं उनकी पढ़ाई में बहुत से व्यवधान आ रहे हैं ।उनका काम समय पर हम तक नहीं पहुंच पाता।

इस दौरान हमने अलग अलग ग्रुप भी बनाए हैं जिनमें अलग-अलग लेवल(स्तर) के हिसाब से बच्चों को पढ़ाया जा रहा है ।

ऑनलाइन टीचिंग के दौरान हमे माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों में एक और सकारात्मक परिवर्तन उन बच्चों में देखने को मिला जो संकोची स्वभाव के हैं जो समूह में अपनी बात कहने से घबराते हैं ।वह अकेले बिना झिझक के ज्यादा अच्छी तरह सीख पा रहे हैं ।इसके अलावा वह बच्चे जो कलाकार प्रकृति के हैं वह भी अकेले में ज्यादा अच्छी तरह अपना काम कर पा रहे हैं। साथ ही हम टीचर को भी इस दौरान अपनी मौखिक क्षमता को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने का मौका मिला है कि किस तरह हम सब अपनी बात को कम शब्दों में सुंदर और प्रभावी ढंग से बच्चों को समझा सके ।हमें भी अपने शिक्षण कला को और बेहतर बनाने का मौका मिला है। अतः हम कह सकते हैं कि ऑनलाइन क्लास स्कूल ना जा पाने की समस्या का विकल्प हो सकता है किंतु स्कूल की कमी को पूरा कर पाने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो सकता ।

कभी-कभी तो ये बच्चे इस तरह की पढाई से ऊब जा रहें हैं क्योकि खेल कूद, कराटे, दौड़ से ये पूरी तरह वंचित हैं ।

स्कूली शिक्षा के दौरान सीखने की प्रक्रिया विद्यालय ,शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच संभव हो सकती है किंतु ऑनलाइन क्लास में इन तीनों के अलावा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का दुरुस्त होना भी बहुत जरूरी है।जहाँ इसकी कमी है वहाँ हम सब को बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है जैसे -

1-मोबाइल एक और घर में पढ़ने वाले बच्चे दो।

2- बिजली की समस्या होने से मोबाइल का समय पर चार्ज ना हो पाना ।

3-छोटे बच्चों के अभिभावकों का समय न दे पाना।

4-क्लास के दौरान घर के सदस्यों का कॉल आ जाना और मोबाइल उपलब्ध ना होना इत्यादि।

ऐसी अनेकों समस्याएं हैं जिनसे शिक्षक और बच्चे दोनों को बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है किंतु इनका समाधान भी अभिभावक के पास ही है ।

यदि वह चाहे तो इसका समाधान ढूंढ सकते हैं ।कुछ अभिभावक तो ऐसे भी हैं जिनको यह लगता है कि "मोबाइल पर क्या पढ़ाई होगी ।"यह तो फीस लेने का एक बहाना मात्र है ।"

तो उन अभिभावकों के लिए मेरा यह सुझाव है कि ऐसे अभिभावकों को बैठकर क्लास के दौरान सुनना और देखना चाहिए कि कक्षा के दौरान क्या सिखाया और पढाया जा रहा है?यदि उनके पास कोई बेहतर सलाह हो तो उससे टीचर को अवश्य अवगत कराएं । 

ऑनलाइन टीचिंग को प्रभावी बनाने में शिक्षक के अतिरिक्त अभिभावकों का भी अपेक्षित सहयोग बहुत जरूरी है तभी यह सुचारू रूप से हो पाएगा नहीं तो यह एक औपचारिकता मात्र बनकर रह जाएगी ।जबकि शिक्षकों को तो अपनी उतनी ही ऊर्जा और समय खर्च करना पड़ रहा है जितना स्कूल में दिया जाता था ।इसलिए अभिभावकों को भी अपना उचित सहयोग हमें समय-समय पर देते रहना चाहिए जिससे एक बच्चा सफलतापूर्वक सीख सकें और सुयोग्य नागरिक बनने में एक कदम आगे बढ़ा सके । 

इस दौरान मैंने पाया कि कुछ बच्चे जिनके माता-पिता अपने बच्चो के सीखने को महत्व दे रहे हैं उनके बच्चे बहुत अच्छी तरह सीख पा रहे हैं ।जैसे -तन्वी ,शिवांश स्वाति ,आदित्य, रूहाना ,आस्था ,असद ,ईशान ,स्तव्य हार्दिक,अर्श, कौशल,अवयुक्ता, तान्या, श्रीवृष्टि,धैवत और आदित्य।इनका सीखना ही हम शिक्षकों को उत्साहित करता है और अधिक से अधिक सिखाने के लिए प्रेरित करता है।

ममता उपाध्याय 

हिंदी शिक्षिका 

वि0सा0पा0वाराणसी ।