Saturday, September 5, 2020

आनलाइन क्लास और मेरा अनुभव

 आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के युग में जैसे हर चीज घर में बैठे उपलब्ध हो जा रही है वैसे ही शिक्षण संबंधी सामग्री भी हमें घर बैठे ही मिल जा रही है ।इसके लिए अनेक प्लेटफार्म है जहाँ ये अकाट्य सत्य हैकि "बच्चे हमारी आखें हैं और शिक्षा उनकी रोशनी" वहां प्रत्येक व्यक्ति का शिक्षित होना अतिआवश्यक है ।अब सवाल ये उठता है कि क्या ऑनलाइन कक्षाएं हमारे स्कूल की कमी को पूरा कर सकने में सक्षम हैं?


क्योकि कोविड 19 महामारी के चलते आज भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के सभी स्कूलों को बंद करना पड़ा है और घर बैठे बच्चो को पढ़ाने का एक विकल्प खोजा गया है जो 3-8साल के बच्चो के लिए तो "ना से हा भला "ही कहा जा सकता है क्योकि इस उम्र के बच्चे किताब की अपेक्षा देखकर, सुनकर और करके ज्यादा सीखते हैं ।यही वो उम्र है जब बच्चा अपने परिवार के बाद समाज से परिचित होता है, उसे नये-नये दोस्त मिलते हैं, टीचर मिलती हैं जिनके सामने अपने अनुभूति को अभिव्यक्त करना सीखता है ।इसलिए कक्षा की सभी गतिविधियों को पूरी तरह सीखा पाना तो संभव नहीं किन्तु इनमें सेअधिकांश गतिविधियों को सिखाने का यथासम्भव प्रयास अवश्य किया जा रहा है जिससे उनकी सीखने की प्रक्रिया को सरल व रोचक बनाया जा सके किन्तु इस कार्य को सफ़ल बनाने में हमें अभिभावक के सहयोग की भी अपेक्षा है क्योंकि बच्चे इस समय उनके साथ हैं हमारे साथ नहीं । मोबाइल में देखना और देखकर समझाना या बताना अब उनकी जिम्मेदारी बन जाती है। इस तरह एक बच्चे को पढ़ाने में दो लोगों को अपना उतना ही समय देना पड़ रहा है ।एक को पठन सामग्री तैयार करके भेजने में तथा दूसरे को बच्चे से करवाने में।स्कूल में यह काम सिर्फ टीचर द्वारा ही हो जाता है।

अतः इस कार्य में जिस बच्चे के अभिभावक जागरूक और शिक्षित हैं उस बच्चे की पढ़ाई तो सुचारू रूप से चल रही है किंतु जिनके अभिभावक जागरूक या शिक्षित नहीं हैं उनकी पढ़ाई में बहुत से व्यवधान आ रहे हैं ।उनका काम समय पर हम तक नहीं पहुंच पाता।

इस दौरान हमने अलग अलग ग्रुप भी बनाए हैं जिनमें अलग-अलग लेवल(स्तर) के हिसाब से बच्चों को पढ़ाया जा रहा है ।

ऑनलाइन टीचिंग के दौरान हमे माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों में एक और सकारात्मक परिवर्तन उन बच्चों में देखने को मिला जो संकोची स्वभाव के हैं जो समूह में अपनी बात कहने से घबराते हैं ।वह अकेले बिना झिझक के ज्यादा अच्छी तरह सीख पा रहे हैं ।इसके अलावा वह बच्चे जो कलाकार प्रकृति के हैं वह भी अकेले में ज्यादा अच्छी तरह अपना काम कर पा रहे हैं। साथ ही हम टीचर को भी इस दौरान अपनी मौखिक क्षमता को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने का मौका मिला है कि किस तरह हम सब अपनी बात को कम शब्दों में सुंदर और प्रभावी ढंग से बच्चों को समझा सके ।हमें भी अपने शिक्षण कला को और बेहतर बनाने का मौका मिला है। अतः हम कह सकते हैं कि ऑनलाइन क्लास स्कूल ना जा पाने की समस्या का विकल्प हो सकता है किंतु स्कूल की कमी को पूरा कर पाने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो सकता ।

कभी-कभी तो ये बच्चे इस तरह की पढाई से ऊब जा रहें हैं क्योकि खेल कूद, कराटे, दौड़ से ये पूरी तरह वंचित हैं ।

स्कूली शिक्षा के दौरान सीखने की प्रक्रिया विद्यालय ,शिक्षक और शिक्षार्थी के बीच संभव हो सकती है किंतु ऑनलाइन क्लास में इन तीनों के अलावा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का दुरुस्त होना भी बहुत जरूरी है।जहाँ इसकी कमी है वहाँ हम सब को बहुत सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है जैसे -

1-मोबाइल एक और घर में पढ़ने वाले बच्चे दो।

2- बिजली की समस्या होने से मोबाइल का समय पर चार्ज ना हो पाना ।

3-छोटे बच्चों के अभिभावकों का समय न दे पाना।

4-क्लास के दौरान घर के सदस्यों का कॉल आ जाना और मोबाइल उपलब्ध ना होना इत्यादि।

ऐसी अनेकों समस्याएं हैं जिनसे शिक्षक और बच्चे दोनों को बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है किंतु इनका समाधान भी अभिभावक के पास ही है ।

यदि वह चाहे तो इसका समाधान ढूंढ सकते हैं ।कुछ अभिभावक तो ऐसे भी हैं जिनको यह लगता है कि "मोबाइल पर क्या पढ़ाई होगी ।"यह तो फीस लेने का एक बहाना मात्र है ।"

तो उन अभिभावकों के लिए मेरा यह सुझाव है कि ऐसे अभिभावकों को बैठकर क्लास के दौरान सुनना और देखना चाहिए कि कक्षा के दौरान क्या सिखाया और पढाया जा रहा है?यदि उनके पास कोई बेहतर सलाह हो तो उससे टीचर को अवश्य अवगत कराएं । 

ऑनलाइन टीचिंग को प्रभावी बनाने में शिक्षक के अतिरिक्त अभिभावकों का भी अपेक्षित सहयोग बहुत जरूरी है तभी यह सुचारू रूप से हो पाएगा नहीं तो यह एक औपचारिकता मात्र बनकर रह जाएगी ।जबकि शिक्षकों को तो अपनी उतनी ही ऊर्जा और समय खर्च करना पड़ रहा है जितना स्कूल में दिया जाता था ।इसलिए अभिभावकों को भी अपना उचित सहयोग हमें समय-समय पर देते रहना चाहिए जिससे एक बच्चा सफलतापूर्वक सीख सकें और सुयोग्य नागरिक बनने में एक कदम आगे बढ़ा सके । 

इस दौरान मैंने पाया कि कुछ बच्चे जिनके माता-पिता अपने बच्चो के सीखने को महत्व दे रहे हैं उनके बच्चे बहुत अच्छी तरह सीख पा रहे हैं ।जैसे -तन्वी ,शिवांश स्वाति ,आदित्य, रूहाना ,आस्था ,असद ,ईशान ,स्तव्य हार्दिक,अर्श, कौशल,अवयुक्ता, तान्या, श्रीवृष्टि,धैवत और आदित्य।इनका सीखना ही हम शिक्षकों को उत्साहित करता है और अधिक से अधिक सिखाने के लिए प्रेरित करता है।

ममता उपाध्याय 

हिंदी शिक्षिका 

वि0सा0पा0वाराणसी ।



No comments:

Post a Comment